अवसाद
आजकल सीने में एक अजीब सा दर्द मेहसूस होने लगा है,
पहले सहलाने पर जो गायब हो जाता था
अभी हर दवा उस पर बेअसर जा रहा है |
जिस ज़ुबां पर हमेशा कोई बात होती थी, उसके लफ़्ज़ टूटने लगे हैं
कभी इतना सन्नाटा होता है जैसे कोई लाश हो |
किसी बिछड़े महबूब की कमी खलने लगी है,
जहां चाह थी किसी के आगोश की वहाँ अपनों की महक भी नसीब नहीं हो रही |
सोते जागते, रात दिन, वक्त कैसे बीत जाता है कोई खबर नहीं रहती,
जिंदगी में भागते-भागते जिस्म जो खाली बनता जा रहा है |
अंधेरे में रोशनी को ढूढ़ना कब छोड़ दिया याद नहीं,
न जाने क्यूँ मौत को आपनी मंज़िल बना दिया |

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