शुक्रगुज़ार

 कहीं आग में जलते को बारिस की नमी मिल जाए 

रेगिस्तान के प्यासे को नहर का नीर मिल जाए, 

सागर में डूबते को जहाज़ का सहारा मिल जाए

और इस मुरझाते जहाँ में मुझे तु मिल जाए, 


गुल खिलते होंगे बाग में, मेरे दिल में शोले खेलते थे |

तूने उन शोलों का दीपक सजाया 

मेरे हर अंधेरी रात को तूने दिवाली बनाया, 


मेरे हर ज़ख्म का मरहम बना तु, 

हर बदसूरती का आशिक बना तु 

अगर इस जिंदगी को क़ुदरत बेघर कर जाए, 

तो इस रूह की आख़िरी पनाह बना तु |



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