दुःख
क्या है दुःख? कभी बचपन में पूछा था,
जब उस काले कौए को गर्मी में मिला न पानी,
परंतु उसे मिल गए कंकर और पत्थर
और मेरे मन में रह गई बस एक कहानी |
दिन बीते और अपने कदमों पर मैं स्वयं चली
न जाने कितने रिश्तेदारों और अजनबियों से मिली,
एक समय ऐसा आया जब सीधे हाथों को तोड़ दिया गया
और मेरे दृढ़ आँखों को झुका दिए गया |
पूछती रही, क्या दोष है मेरा?
सुनाई दिया, निर्बलता ही मेरा सबसे बड़ा दाग है,
जहाँ एक राजा के हाथो हत्या को भुला दिया जाता
और एक रंक की अवज्ञा पाप है |
ग़रीबों में कहीं कोई कमल खिले भी तो
उसे फेंक कर तोड़ दिया जाता है,
जिनके सर धर्म से काट देने चाहिए थे
उनके आगे भी सर झुकाना पड़ता है |
जहां हाथ इस प्रकार बंधे हो कि
अन्याय को हँसकर पीना पड़ता है,
त्यौहार के दिन रोशनी को छोड़कर
अँधेरों में सोना पड़ता है |
जब भूल न हो कर भी
थप्पड़ की पीड़ा सहनी पड़ती हैं,
और किसीके कठिन श्रम के फल को
नकार दिया जाता है |
जहाँ सत्य कहते लोग भी भय में रहते हैं
और प्रेम का हर कण अदृश्य होता जाता है,
जब शांति की हर चेष्टा अश्रु ले आती हो
और जीवन एक श्रापित समय लगती हो...
उसे ही तो दुःख कहा जाता है |

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