हे प्रभु


 वर्षा जब छाए धरती पर शीतल होता जग सारा

ग्रीष्म कष्ट से तड़पती जीवन को मिल जाती है जलधारा,

ऐसे ऋतु के बीच जन्मे थे तुम जगमोहन

आकर तुम छोड़ गए एक उत्तम जीवन का वर्णन |

जो भी सुने तुम्हारी वाणी उसके मन में सांति छाए

जो भी समझे तुम्हारा जीवन, नाम तुम्हारें भजन करते जाए,

इधर उधर से भटक-भटक कर तुम्हारें द्वार पर आयी हूँ

अपने जीवन के सुख दुःख का एक छोटा बक्सा लायी हूँ |

आपकी गीता कहती हैं कि कर्म ही एकमात्र हमारा है

बाक़ी सबकुछ जीवन में भिन्न रंगों की मोह-माया है,

हर आनंद का अनुभव आप ही का उपहार है

हर निराशा की छाया कुछ अश्रु का सहारा है |

है श्री कृष्ण मुझे समझाओ कैसे न हो मुझसे कोई भूल

कैसे अपने प्रियजनों पर न पड़ने दूँ कोई धूल,

जगत मंगल की अभिलाषा अपने हाथों से ही पूर्ण करूँ

उचित समय पर आपके नाम से अपनी अंतिम निःश्वास भरू |

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