क्या मैं भूलने लगा हूँ?
सुबह उठकर ख़ुदा के बाद तुम्हारें अलावा किसी हमदर्द का नाम लेने लगा हूँ,
जहां किसी दिन तुम्हारा नाम लिखता था वहां मैं किसी और का नाम लिखने लगा हूँ |
अब तुम्हारी उस गुलाबी सलवार से ज्यादा मुझे मेरी नीली रुमाल अच्छी लगती है,
उस रुमाल से मैं तुम्हारे होठों की खुशबु को खोने लगा हूँ |
बारिश के छलकते बूंदों के साथ जब तुम नाचती थी,
वो नज़ारे अब गुम हो रहे हैं |
तुम्हारें हाथो से भरें वो मेरे सारे पन्ने,
उन लफ़्ज़ों से मैं कहीं छुपने लगा हूँ |
मेरी पुरानी किताबों में रखी वो तस्वीर तुम्हारी,
उसे ईन दिनों देखने का मन नहीं करता
शायद मैं हमारी यादों को ख़ुद से एक-एक कर ज़ुदा करने लगा हूँ |
उस सर्द के दोपहर में जब हम लिपट कर खूब रोये थे,
वो पल मुझे अब बिल्कुल याद नहीं आता
क्या अखिर वक्त के साथ मैं तुम्हें धीरे-धीरे अपनी जिंदगी से भूलने लगा हूँ?

हाए ये मौत हमे दिल से गले लगाए!
ReplyDeleteI hope you enjoy this poetry, if any queries please ask!